क्यों और कैसे होता है मोतियाबिंद | Cataract in Hindi

मोतियाबिंद को इंग्लिश में कैटरेक्ट (Cataract) कहा जाता है. यह आँखों से जुड़ी एक समस्या है जो आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ होता है. इस समस्या के कारण पीड़ित को देखने में कठिनाई महसूस होती है.

लेकिन मोतियाबिंद को अच्छे से समझने के लिए हमे पहले ये समझना होगा की हमारी आँखे कैसे काम करती हैं और आँखों में किस बदलाव के कारण हमे मोतियाबिंद हो सकता है.

Motiyabind - Cataract in Hindi

कैसे होता है मोतियाबिंद? (How cataract forms - Hindi )

हमारी आँखे हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण और जटिल अंग है. लेकिन साधारण तरीके से समझने के लिए- हमारी आँखों में एक पारदर्शी लेंस होता है, आँख का पर्दा होता है जिसे इंग्लिश में रेटिना (Retina) कहा जाता है और तंत्रिकाओं का जाल होता है.

बाहर से आने वाली रौशनी पारदर्शी लेंस से हो कर गुजरती हैं. लेंस इन रौशनी को आँखों के पर्दों पर फोकस करती हैं जिससे हमे एक साफ़ छवि दिखती है. तंत्रिकाओं के ही मदद से इन छवियों को समझने में हमारा दिमाग हमारी मदद करता है.

हमारी आँखों की लेंस पानी और प्रोटीन से बानी होती हैं. इसके फाइबर की खास अरेंजमेंट के कारण हमारे आँखों की पारदर्शिता बानी रहती है. बाहर से वाली रोशनी की एक साफ़ छवि बनने के लिए लेंस की पारदर्शिता बेहद आवश्यक है.

मोतियाबिंद तब शुरू होता है जब आंखों में प्रोटीन के ऐसे गुच्छे बन जाते हैं जो लेंस को रेटिना तक स्पष्ट चित्र भेजने से रोकते हैं।

क्यों होता है मोतियाबिंद? (Why cataract happens - Hindi)

मोतियाबिंद उम्र से सम्बंधित एक समस्या है, यह कोई बीमारी नहीं है. जिस प्रकार उम्र बढ़ने के साथ-साथ हमारे चेहरों पर झुर्रियाँ आ जाती है और हमारे बाल सफ़ेद होने लगते हैं, उसी प्रकार उम्र बढ़ने के साथ लेंस में मौजूद प्रोटीन टूटने लगते हैं और कभी-कभी पानी भी बढ़ जाती है जिसके कारण मोतियाबिंद की समस्या हो सकती है.

इन वजहों से लेंस अपनी पारदर्शिता उम्र बढ़ने के साथ खोने लगते हैं और फिर दिखाई देने में दिक्कत होने लगती है. मोतियाबिंद दोनों आँखों में हो सकता है लेकिन आमतौर पर यह दोनों आँखों में एक साथ नहीं होता.

मोतियाबिंद के लक्षण (Symptoms of cataract - Hindi)

इन लक्षणों को पहचान कर मोतियाबिंद के होने का पता लगाया जा सकता है-

  • धुंधला नजर आना
  • रात को देखने में परेशानी होना
  • रंगों का फीका दिखना
  • हर चीज की दो छवि दिखना
  • बार-बार चश्मे का नंबर बदलना
  • तेज रौशनी के लिए संवेदनशीलता बढ़ जाना

मोतियाबिंद के कारण (Causes of cataract - Hindi)

मोतियाबिंद होने के बहुत से कारण हो सकते हैं.

  • धूम्रपान
  • अल्ट्रावायलेट रेडिएशन
  • स्टेरॉयड और अन्य दवाओं का लंबे समय तक उपयोग
  • कुछ रोग, जैसे कि मधुमेह
  • ट्रामा
  • रेडिएशन चिकित्सा

ये सभी मोतियाबिंद के मुख्य कारण हैं. इसके अलावा बढ़ती उम्र, ज्यादा शराब का सेवन, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, आँख में पुरानी चोट, सूरज की रौशनी में ज्यादा रहना, एक्स-रे या कैंसर उपचार के दौरान रेडिएशन के प्रभाव में ज्यादा रहना और मोतियाबिंद का पारिवारिक इतिहास भी मोतियाबिंद के कारण बन सकते हैं.

Motiyabind Cataract in Hindi

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मोतियाबिंद का इलाज (Treatments of cataract - Hindi)

मोतियाबिंद की पहचान करने के लिए आपके डॉक्टर आपकी आँखों पर कई तरह के टेस्ट कर सकते हैं. सबसे आम परिक्षण है आपके आँखों के कॉर्निया को समतल करने के लिए हवा के कश का उपयोग करना और फिर आँखों के दबाव की जांच करना. डॉक्टर आपकी आँखों के पुतली को बड़ा करने के लिए उसमें ड्राप डाल सकते हैं ताकि ऑप्टिक नर्व और रेटिना की जांच आसानी से की जा सके.

जब मोतियाबिंद के कारण आपके दैनिक गतिविधियों में परेशानी बढ़ जाती है तब डॉक्टर आपको सर्जरी द्वारा उपचार की सलाह दे सकते हैं. मोतियाबिंद को हटाने के लिए सर्जरी आमतौर पर बहुत सुरक्षित होती है और इसकी सफलता दर बहुत अधिक होती है. ज्यादातर लोगों को सर्जरी होने के कुछ घंटों बाद ही घर जाने की अनुमति मिल जाती है.

मोतियाबिंद से बचाव के उपाय (Prevention of cataract - Hindi)

मोतियाबिंद होने के जोखिमों को इस प्रकार कम किया जा सकता है-

  • दिन में बाहर जाते समय धुप का चश्मा अवश्य पहने
  • धूम्रपान से दूर रहें
  • एंटीऑक्सिडेंट्स युक्त फलों और सब्जियों का सेवन ज्यादा करें
  • शरीर के वजन को नियंत्रित रखें
  • डायबिटीज और अन्य चिकित्सीय स्थितियों को ध्यान में रखें
  • आंखों की नियमित जांच करवाएं

मोतियाबिंद (Cataract) हमारे दैनिक गतिविधियों में हस्तक्षेप कर सकता है और उपचार न कराने पर यह अंधेपन का कारण भी बन सकता है. हालाकि कुछ मोतियाबिंद बढ़ना बंद हो सकते हैं, लेकिन बिना उपचार के ये खुद से कम या छोटे नहीं हो सकते.

मोतियाबिंद को हटाने के लिए सर्जरी आमतौर पर बहुत सुरक्षित होती है और यह 90 प्रतिशत से ज्यादा प्रभावी उपचार है. आँखों में किसी प्रकार की समस्या होने पर अपने डॉक्टर से संपर्क करें.

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Kushtarog | क्या होता है कुष्ठ रोग | Leprosy explained in Hindi

कुष्ठ रोग को अंग्रेजी में Leprosy कहा जाता है. यह एक ऐसी संक्रामक बीमारी है जो Mycobacterium Laprae नामक जीवाणु से होता है. एक कुष्ठ रोगी के शरीर के बाहों, पैरों और त्वचा के क्षेत्रों में तंत्रिका क्षति या गंभीर घावों को देखा जा सकता है. यह रोग शादियों से चला आ रहा है और यह दुनिया के हर कोने में पाया जाता है.

कुष्ठ रोग एक संक्रामक रोग जरूर है लेकिन यह आसानी से नहीं फैलता. इसके संक्रमण होने की संभावना काफी कम है. कुष्ठ रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तभी फैलता है जब दोनों व्यक्ति एक-दूसरे से लम्बे समय तक साथ में रहें या बार-बार संपर्क में आते रहें. एक कुष्ठ रोगी के खांसने या छींकने के दौरान नाक या मुँह से निकलने वाले ड्रॉप्लेट्स से यह बीमारी फैलता है.

kushtarog or leprosy explained in hindi

कुष्ठ रोग एक ग्रसित गर्भवती महिला से उसके अजन्मे बच्चे तक नहीं फैलता. यह यौन संपर्क द्वारा भी प्रसारित नहीं होता. कुष्ठ रोगी के साथ बैठने, खाना खाने या हाथ मिलाने से कुष्ठ रोग नहीं फैलता.

होने को यह रोग एक छोटे से बच्चे से लेकर बड़े-बूढ़े व्यक्ति तक में पाई जा सकती है. लेकिन वयस्कों की तुलना में बच्चों को कुष्ठ रोग होने की अधिक संभावना है. इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति कुपोषण का शिकार है तो उसे कुष्ठ रोग होने की संभावना ज्यादा होती है. वहीं दूसरी तरफ, एक स्वस्थ व्यक्ति में यह बीमारी होने की संभावना कम रहती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, आज के समय में दुनिया भर में तकरीबन 2 लाख से ज्यादा कुष्ठ रोगी हैं और इनमे से सबसे ज्यादा अफ्रीका और एशिया में हैं.

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कुष्ठ रोग के लक्षण (Symptoms of Leprosy in Hindi)

कुष्ठ रोग मुख्य रूप से आपकी मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के बाहर की नसों और त्वचा को प्रभावित करता है. यह आपकी आँखों और आपकी नाक के अंदर के पतले ऊतक को भी प्रभावित कर सकता है. अक्सर कुष्ठ रोग का प्रभाव शरीर के उन हिस्सों में ज्यादा होता है जिनका तापमान बाकी हिस्सों से कम रहता है, जैसे कि हमारी आँखे, त्वचा, नसें, नाक और कान. इस बीमारी में नजर कमजोर पड़ जाती है और हाथ और पैर सुन्न पड़ जाते हैं. इसके अलावा मरीज के हाथों और पैरों में लगातार घाव होते रहते हैं या गांठ हो जाते हैं और त्वचा पर पीले रंग के धब्बे भी पड़ जाते हैं.

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आमतौर पर कुष्ठ रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया के संपर्क में आने के बाद लक्षण दिखने में लगभग 3 से 5 साल लग जाते हैं.

कुष्ठ रोग के प्रकार (Types of Leprosy in Hindi)

कुष्ठ रोग का प्रकार त्वचा के घाव के प्रकार और संख्या पर आधारित है. कुष्ठ के प्रकार हैं-

☉ टूबर्क्युलॉइड (Tuberculoid). यह कुष्ठ रोग का सबसे कम गंभीर रूप है जिसमे व्यक्ति के शरीर पर कुछ पीले रंग की त्वचा हो जाती है. अन्य प्रकार की तुलना में यह कुष्ठ रोग कम संक्रामक होता है.

☉ लेप्रोमाटोस (Lepromatous). यह कुष्ठ रोग का एक गंभीर रूप है जिसमे व्यक्ति के त्वचा पर धक्के (skin bumps) और चकत्ते (rashes), अंगों का सुन्न हो जाना और मांसपेशियों में कमजोरी हो जाती है. इस प्रकार के कुष्ठ रोग में किडनी, नाक और पुरुष प्रजनन अंग भी प्रभावित हो सकते हैं. यह टूबर्क्युलॉइड कुष्ठ रोग की तुलना में अधिक संक्रामक है.

☉ बॉर्डरलाइन. इस प्रकार के कुष्ठ रोग में टूबर्क्युलॉइड और लेप्रोमाटोस दोनों कुष्ठ रोगों का मिला-जुला लक्षण देखा जा सकता है.

क्या कुष्ठ रोग का इलाज संभव है?

कुष्ठ रोग को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है और सरकार के तरफ से इसका इलाज मुफ्त में मुहैया करवाया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, विश्व भर में पिछले दो दशकों में कुष्ठ रोग के लगभग 1.6 करोड़ मरीज ठीक हुए हैं.

कुष्ठ रोग का इलाज 6 महीने से एक साल तक चल सकता है. ज्यादातर कुष्ठ रोग का इलाज कुछ दवाइयों से ही किया जाता है. इसका इलाज पूरा हो जाने के बाद वह व्यक्ति किसी भी दूसरे व्यक्ति को संक्रमित नहीं कर सकता और वह व्यक्ति अपना जीवन सामान्य रूप से बिता सकता है. जिस व्यक्ति के हाथों और पैरों में कुष्ठ रोग के कारण विकृति उत्पन्न हो जाती है, उसका भी आधुनिक सर्जरी द्वारा इलाज संभव हैं.

कुष्ठ रोग का समय पर इलाज न होने से आपके त्वचा, नसों, हाथों, पैरों और आँखों में स्थाई रूप से नुकसान पहुंच सकता है.

यह आर्टिकल सिर्फ आपको कुष्ठ रोग की जानकारी देने के लिए है. किसी भी प्रकार के लक्षण दिखने या परेशानी होने पर डॉक्टर से संपर्क करें. To know more about Leprosy in english, visit WebMD.

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हार्ट अटैक के कारण और लक्षण - Causes and Symptoms of Heart Attack

वैश्विक स्तर पर हृदय रोग मौत का सबसे मुख्य कारण है. दुनिया भर में हर साल अनुमानित 1.8 करोड़ लोगों की जान हृदय रोग के कारण जाती है. हृदय रोग कई प्रकार के होते हैं और हृदय रोग से सम्बंधित हर 5 में से 4 मौतें दिल के दौरे, यानि हार्ट अटैक के कारण होती है. इनमें से एक-तिहाई मौतें 70 साल से कम उम्र के लोगों में होती हैं और इनमे से 75 प्रतिशत से ज्यादा मौतें विकासशील देशों में होती हैं.

causes and symptoms of heart attack
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हार्ट अटैक के कारण (Causes of Heart Attack)

ज्यादातर हार्ट अटैक तब होता है जब एक या एक से अधिक कोरोनरी आर्टरी (जिसका काम दिल के मांसपेशियों में खून पंहुचाना है) ब्लॉक हो जाती है. समय के साथ आर्टरी में फैट और कोलेस्ट्रॉल जमने से आर्टरी और भी संकरी हो जाती है जो हार्ट अटैक का कारण बन जाता है. आर्टरी में ज्यादा कोलेस्टेरोल जम जाने से रक्तप्रवाह में बाधा आ सकती है, जिससे दिल में ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो जाती है.

हार्ट अटैक का दूसरा कारण कोरोनरी आर्टरी में ऐंठन आना भी है, जिससे दिल के मांसपेशियों में रक्त का प्रवाह बंद हो जाता है. तंबाकू और अवैध ड्रग्स, जैसे कोकेन, के सेवन से यह जानलेवा समस्या हो सकती है.

तंबाकू (सिगेरट, बीड़ी, पान, गुटखा, आदि) का सेवन, हाई ब्लड प्रेशर, हाई ब्लड कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, डायबिटीज, शारीरिक गतिविधि की कमी, तनाव, अवैध ड्रग्स का सेवन और दिल के दौरे पड़ने का पारिवारिक इतिहास हार्ट अटैक के जोखिम को बढ़ा सकते हैं.

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हार्ट अटैक के लक्षण (Symptoms of Heart Attack)

दुनिया भर में लाखों लोग हृदय के दौरे के जोखिमों को नियंत्रित करने के लिए संघर्ष करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कई अन्य लोग इस बात से अनजान रहते हैं कि उन्हें हार्ट अटैक आने का जोखिम अन्य लोगों के मुकाबले ज्यादा है. जहाँ आवश्यक हो वहाँ बड़ी संख्या में हार्ट अटैक और स्ट्रोक के जोखिमों को जीवनशैली में परिवर्तन लाकर या इलाज द्वारा कम किया जाता है.

ये हार्ट अटैक के लक्षण हैं-

  • दबाव, जकड़न, दर्द, या आपकी छाती या बाहों में एक निचोड़, जलन या दर्द की अनुभूति जो आपकी गर्दन, जबड़े या पीठ तक फैल सकती है
  • मतली, अपच या पेट दर्द
  • सांस लेने में कठिनाई
  • पसीना आना
  • थकान महसूस होना
  • सर हल्का महसूस होना या अचानक चक्कर आना

ऐसे सभी लोग जिन्हे हार्ट अटैक आए हैं, उनमे लक्षण और लक्षणों की गंभीरता एक जैसी नहीं होती. कुछ लोगों को हल्का दर्द हो सकता है तो कुछ लोगों को गंभीर दर्द हो सकता है. कुछ लोगों में कोई लक्षण नहीं होते हैं. कुछ लोगों को अचानक हार्ट अटैक भी हो सकता है. लेकिन ज्यादातर लोगों को चेतावनी के संकेत और लक्षण घंटे, दिन या सप्ताह पहले से होते हैं. हालांकि, आपके पास जितने अधिक लक्षण हैं, उतना ही ज्यादा आपको हार्ट अटैक आने की संभावना है.

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चेतावनी के संकेतों और लक्षणों के दिखते ही तुरंत हरकत में आइये. कुछ लोग बहुत लंबा इंतजार करते हैं क्योंकि वे महत्वपूर्ण संकेतों और लक्षणों को नहीं पहचान पाते हैं. जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी डॉक्टर से संपर्क करने का प्रयत्न करें. डॉक्टर के सलाह के बिना खुद से किसी भी प्रकार की दवा नहीं लेनी चाहिए.


How To Prevent Pregnancy - Explained in Hindi

गर्भनिरोधक का उपयोग गर्भावस्था को रोकने के लिए किया जा सकता है और यह आपको यौन संचारित संक्रमण यानि सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज (STI) से भी बचा सकते हैं. प्रेगनेंसी से बचने के लिए हमारे पास बहुत सारे साधन उपलब्ध हैं. इनमे से कुछ साधन परमानेंट (स्थायी) होते हैं और कुछ टेम्परोरी (अस्थायी).

How to prevent pregnancy in hindi
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लेकिन हो सकता है आप यह सोचती हों कि कौन सा तरीका बर्थ कंट्रोल के लिए सही रहेगा. आपके मन में यह भी सवाल आ सकता है कि प्रेगनेंसी को रोकने के लिए कौन सा तरीका सबसे सही है, किससे आपके सेहत को नुक्सान पहुंच सकता है, गर्भनिरोधक के क्या साइड इफेक्ट्स हैं, आदि. इस आर्टिकल में हम उन सभी गर्भनिरोधक तरीकों के बारे में आपको जानकारी देंगे जो महिलाओं के लिए उपलब्ध हैं.

बर्थ कंट्रोल का जो परमानेंट तरीका होता है उसे बच्चे बंद करने का ऑपरेशन कहते हैं, जिसे नसबंदी भी कहा जाता है. यह ऑपरेशन पुरुष या महिला, कोई भी करा सकता है. पुरुषों में इस ऑपरेशन को वासेक्टोमी (vasectomy) कहते हैं और यह पुरुषों के लिए एक सरल और स्थायी नसबंदी प्रक्रिया है. महिलाओं में इस ऑपरेशन को टुबल लिगेशन (tubal ligation) कहते हैं, लेकिन यह ऑपरेशन वासेक्टोमी के मुकाबले थोड़ा दर्दनाक हो सकता है.

स्थायी नसबंदी की प्रक्रिया सरल होती है, लेकिन इसे उल्टा करना, यानि नसबंदी हटाना, मुश्किल, महंगा और असफल हो सकता है. इसके अलावा नसबंदी आपको सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज से भी नहीं बचाता है.

बर्थ कंट्रोल का सबसे सरल, सस्ता और प्रभावी अस्थायी तरीका है कॉन्डम. कॉन्डम न सिर्फ अनचाहे गर्भ से बचाता है, बल्कि यह सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज से भी बचाता है. गर्भनिरोधक के इस तरीके का इस्तेमाल कभी भी किया जा सकता है, यह हॉर्मोन मुक्त है, आप इसे आसानी से अपने साथ रख सकते हैं और कॉन्डम पुरुष और महिला दोनों के लिए उपलब्ध होता है.

How to prevent pregnancy
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दूसरा प्रभावी अस्थायी तरीका है इंट्रा यूट्राइन कॉन्ट्रासेप्टिव डिवाइस, जिसे कॉपर-टी भी कहा जाता है. यह छोटा, टी-आकार का उपकरण प्रोजेस्टेरोन हार्मोन या प्लास्टिक और तांबे से बना होता है और एक प्रशिक्षित स्वास्थ्य सेवा प्रदाता द्वारा एक महिला के गर्भाशय के अंदर इसे फिट किया जाता है. यह गर्भनिरोधक का एक लंबा तरीका है, जो कि 3 से 10 साल तक बना रह सकता है और आप कभी भी इसे निकलवा सकती हैं. इसका फायदा यह है कि इससे दर्द नहीं होता और इसका शरीर पर कोई बुरा असर भी नहीं होता. लेकिन इसे लगवाने के 2 से 3 महीने तक अनियमित रक्तस्राव और स्पॉटिंग की समस्या हो सकती है, मगर यह समय के साथ ठीक हो जाता है. यह आपको सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज से नहीं बचाता.

Methods to prevent pregnancy
कॉपर-टी | Image Source : Link

बर्थ कंट्रोल के लिए हॉर्मोनल तरीकों में सबसे आम है ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स. यह दिन में एक बार ली जाने वाली टैबलेट होती है. यह टैबलेट कई किस्म की आती हैं और आपको कौन सी टैबलेट सूट करेगी, यह आपको आपके डॉक्टर बताएंगे. सही तरीके से उपयोग किये जाने पर यह अत्यधिक प्रभावी होती है और इससे ब्लीडिंग भी कम हो जाती है. आप पिल्स का इस्तेमाल लगभग पांच साल तक कर सकते हैं. लेकिन अपनी गोली भूल जाने का मतलब है कि यह उतना प्रभावी नही होगा. यह आपको सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज से नही बचाता.

गर्भनिरोधक के लिए एक और तरह की पिल्स होती है जिसे इमर्जेन्सी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स या i-pill कहते हैं. इसका इस्तेमाल रोज नहीं किया जाता, बल्कि यह अनप्रोटेक्टेड सेक्स के बाद इमर्जेन्सी में ली जाती है. एक बिना प्रिकॉशन के यौन संबंध के बाद इसे तुरंत लेना चाहिए. जितनी जल्दी इसे लिया जाता है, यह उतना ही प्रभावी होता है. जब सेक्स के बाद पहले तीन दिनों में इसे लिया जाता है, तो यह लगभग 85% अपेक्षित गर्भधारण को रोकता है. इसे बिना प्रिस्क्रिप्शन के किसी फार्मेसी या केमिस्ट के काउंटर पर खरीदा जा सकता है. i-pill के सामान्य दुष्प्रभावों में मतली, उल्टी और अगली अवधि जल्दी या देरी से हो सकती है. यह आपको सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज से नहीं बचता.

इन सबके के अलावा गर्भनिरोधक के कुछ और भी तरीके होते हैं, जैसे कि कंट्रासेप्टिव इम्प्लांट- इसमें हार्मोन प्रोजेस्टेरोन का एक रूप जारी करते हुए, एक महिला की ऊपरी बांह में त्वचा के नीचे एक छोटी, लचीली छड़ रखी जाती है और इसे तीन साल बाद बदलने की आवश्यकता होती है. यह एक प्रभावी गर्भनिरोधक तरीका है लेकिन इसे आपके शरीर में डालने और हटाने के लिए एक प्रशिक्षित स्वास्थ सेवा प्रदाता की आवश्यकता होती है और यह आपको सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज से भी नहीं बचाता.

कॉन्ट्रासेप्टिव इंजेक्शन भी एक प्रकार का प्रभावी गर्भनिरोधक तरीका होता है जिसमे हार्मोन प्रोजेस्टोजन का सिंथेटिक संस्करण एक इंजेक्शन द्वारा आपके शरीर में डाला जाता है. इसका प्रभाव लगभग तीन महीने तक रहता है. इसको लेने से अनियमित रक्तस्राव की समस्या हो सकती है और यह आपको सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज से नहीं बचाता.

कंट्रासेप्टिव रिंग या वजाइनल रिंग एक लचीली प्लास्टिक की अंगूठी होती है जिसे महिला अपने योनि में रखती है और यह अंगूठी लगातार आपके शरीर में हार्मोन एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टोजन जारी करती है. यह तीन सप्ताह तक रहता है, और फिर आपको इसे हटाना होता हैं, एक सप्ताह की छुट्टी लेने के बाद आपको फिर से एक दूसरे अंगूठी को अपने योनि में रखना होता है. वजाइनल रिंग को आप स्वयं ही अपने योनि में रख और निकाल सकती हैं, लेकिन आपको इसे सही समय पर बदलने के लिए याद रखने की आवश्यकता है और यह आपको सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज से नहीं बचाता.

कंट्रासेप्टिव रिंग | Image Source : Link

डायाफ्राम भी एक प्रकार का कॉन्ट्रासेप्टिव डिवाइस होता है जो एक छोटा, मुलायम सिलिकॉन से बना गुंबद होता है जिसे सेक्स से पहले योनि में शुक्राणु को गर्भाशय में प्रवेश करने से रोकने के लिए डाला जाता है. इसे सेक्स के बाद भी कम से कम 6 घंटे के लिए छोड़ना पड़ता है लेकिन 24 घंटे से पहले इसे निकाल कर धोना होता है. अच्छे तरीके से साफ़ करके डायाफ्राम का इस्तेमाल एक से ज्यादा बार किया जा सकता है. डायाफ्राम काफी अच्छी तरह से काम करता है अगर सही तरीके से उपयोग किया जाए. हालांकि डायाफ्राम सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज के खिलाफ सुरक्षा प्रदान नहीं करता.

अब इनमे से कौन सा गर्भनिरोधक तरीका आपके लिए सही रहेगा, यह जानने के लिए अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें.


सूखी खांसी (Dry cough) से आराम पाने के घरेलू उपाय

ठंड का मौसम आते ही खांसी, जुखाम, बुखार और गले में खरास जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं. हममे से ज्यादातर लोगों को इन समस्याओं का सामना करना पड़ता है. खांसी की समस्या कई दिनों तक हमे परेशान कर सकती है. साधारण खांसी तो फिर भी आसानी से ठीक हो सकता है, लेकिन सूखी खांसी, जिसे Dry Cough भी कहते हैं, कई दिनों तक हमारा पीछा नहीं छोड़ती.

आपको सर्दी या फ्लू होने के बाद सूखी खाँसी हफ्तों तक जकड़ सकती है. वे कई स्थितियों के कारण भी हो सकते हैं, जैसे:

1. पोस्ट नेसल ड्रिप
2. अस्थमा
3. अम्ल प्रतिवाह

Home remedies to cure dry cough - sukhi khasi
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सूखी खांसी बहुत असहज हो सकती है और बच्चों और वयस्कों दोनों में हो सकती है. ऐसे कई उपचार हैं जिनका उपयोग आप उन्हें कम करने के लिए कर सकते हैं, लेकिन ऐसे घरेलू उपचार भी हैं जो कई मामलों में प्रभावी हो सकते हैं.

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1. शहद

शहद में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं और यह जलन को कम करने के साथ गले को साफ़ करने में भी मदद कर सकता है. शहद का उपयोग वयस्कों और 1 वर्ष से ज्यादा आयु वाले बच्चों को सूखी खांसी से आराम दिलाने के लिए किया जा सकता है. सूखी खांसी से आराम पाने के लिए आप दिन में कई बार एक-एक चम्मच शहद का सेवन कर सकते हैं या गुनगुने पानी में या चाय में डालकर भी आप शहद का सेवन कर सकते हैं. 1 साल से कम उम्र वाले बच्चो को शहद न पिलाएं.

2. अदरक

अदरक में एंटीबैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं. अदरक हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाए रखने और बेचैनी से राहत दिलाने में कारगर है. सूखी खांसी के लिए अदरक को चाय में डाल कर पीने से आपको राहत मिल सकती है. आप अदरक के छोटे से टुकड़े को चबा भी सकते हैं.

3. हल्दी

हल्दी में एंटीबैक्टीरियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-वायरल गुण होते हैं. हल्दी का इस्तेमाल हम हमेसा से करते आ रहे हैं. भोजन से लेकर गंभीर बिमारियों के इलाज तक, हम हल्दी का इस्तेमाल करते हैं. सूखी खांसी से आराम के लिए चुटकी भर हल्दी पाउडर को गरम दूध में मिला कर या गुनगुने पानी में डाल कर सेवन करने से आपको आराम मिल सकता है.

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4. चाय और काढ़ा

सर्दी-जुखाम हो या खांसी, बचपन से ही हम यह सुनते आ रहे हैं कि चाय और काढ़ा पीने से हमे इससे आराम मिल सकता है. चाय में इलाइची डालकर या काढ़े में अजवाईन डालकर पीने से सूखी खांसी से राहत मिल सकता है.

5. नमक-पानी से गरारा

गर्म खारे पानी से गरारे करने से सूखी खांसी के कारण होने वाली परेशानी और जलन को कम करने में मदद मिल सकती है. नमक का पानी मुंह और गले में बैक्टीरिया को मारने में भी मदद करता है. इसके लिए, गुनगुने पानी में एक छोटी चम्मच नमक मिलाकर दिन में कई बार गरारा करें. हलाकि यह नमक-पानी से गरारा करने का उपाय छोटे बच्चों के लिए अनुशंसित नहीं है क्योंकि वे खारे पानी को निगल सकते हैं.

सूखी खांसी महीनों तक रह सकती है. आमतौर पर सूखी खांसी अपने आप बंद हो जाती है. लेकिन अगर आप की खांसी अन्य लक्षणों के साथ आए, जैसे कि सांस लेने में तकलीफ, छाती में दर्द, पीठ दर्द, बुखार, ठंड, आदि, तो अपने डॉक्टर से तुरंत सलाह लें.

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सर्दी में अदरक खाने के फायदे - Benefits Of Ginger-Hindi

ठण्ड के मौसम में हमें अपनी सेहत को लेकर ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ती है. सर्दी-जुखाम, खांसी, बुखार और गले में खरास जैसी समस्याओं का सामना ज्यादातर हमे ठण्ड के मौसम में ही करना पड़ता है. ऐसे में अपने इम्यून सिस्टम को बजबूत बनाए रखने के लिए हमे ऐसी चीजों का सेवन ठण्ड में ज्यादा करना पड़ता है जिससे हम इन समस्याओं से दूर रह सकें.

अदरक हमारे किचन में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला आयुर्वेदिक औसधि है. हम अदरक का इस्तेमाल कई प्रकार के आहार में करते हैं. अदरक का इस्तेमाल हमारे घरों में काढ़ा और चाय बनाने में भी होता है. आइये जानते हैं अदरक के गुणों के बारे में और ये भी की सर्दियों में स्वस्थ रहने के लिए हम अदरक का इस्तेमाल कैसे करें.

adarak ke fayde, Health benefits of eating Ginger in Hindi
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1. आलस्य और थकान दूर करता है अदरक

बहुत से लोगों को सर्दियों में आलस्य, थकान और सिर दर्द का सामना करना पड़ता है. खासकर गर्भवती महिलाओं में ये समस्या ज्यादा देखी गई है. अदरक में पाए जाने वाला विटामिन B6 हमे थकान, आलस्य और सिर दर्द की समस्या से आराम दिला सकता है. इस समस्या से आराम पाने के लिए सुबह अदरक का सेवन काढ़ा बनाकर कर सकते हैं.

2. खाना पचाने में मदद करता है अदरक

अदरक हमारे पाचन क्रिया को स्वस्थ बनाए रखने में हमारी मदद कर सकता है. जिन लोगो को अक्सर पाचनतंत्र से सम्बंधित समस्याएँ रहती है, उन्हें खासतौर पर अदरक का सेवन करना चाहिए. अदरक हमारे पित्ताशय से बाइल जूस उत्पादन की प्रक्रिया को उत्तेजित करने में मदद कर सकता है. इससे हमे पाचनतंत्र और पेट के गैस संबंधी समस्याओं से आराम मिल सकता है.

3. एलर्जी को दूर कर सकता है अदरक

हममें से ज्यादातर लोगों को किसी न किसी प्रकार की एलर्जी होती है. सर्दी-जुखाम, खांसी और छींक किसी न किसी एलर्जी का असर हो सकता है. अदरक का सेवन एलर्जी के असर को कम करने में हमारी मदद कर सकता है. दरअसल, अदरक में मौजूद एंटी-हेस्टामाइन एलर्जी के असर को कम करने में मदद करता है. इसलिए सर्दियों में अगर बिना किसी कारण के आपको छींक या खांसी आने लगे तो किसी न किसी रूप में आप अदरक के इस्तेमाल को थोड़ा बढ़ा दें.

4. पेट दर्द से राहत दिला सकता है अदरक

ठंड लगने से होना वाला पेट दर्द या महिलाओं में मासिकधर्म के दौरान होने वाला पेट दर्द और मरोड़ एक आम बात है. लेकिन अदरक का सेवन हमे इन समस्याओं से राहत दिला सकता है. अदरक को काढ़े में डालकर या चाय में डालकर पीने से आपको पेट दर्द से राहत मिल सकता है.

अदरक खाने के अनेको फायदे हैं. वर्षों से हम इसे अपने आहार में इस्तेमाल करते आ रहे हैं. ठंड में होने वाले सर्दी-जुखाम, खांसी, बंद नाक और गले में खरास से राहत पाने के तो हम अदरक इस्तेमाल करते ही हैं, लेकिन इसके अलावा कई बड़ी बिमारियों को ठीक करने में भी अदरक अहम भूमिका निभाता है. अदरक के सेवन से हमे हृदय रोग, ब्लड शुगर की समस्या, डायबिटीज, तनाव और कैंसर जैसी कई अन्य बड़ी बिमारियों में भी राहत मिलता है. शायद इन्ही कारणों से हम हमेसा से अदरक का इस्तेमाल करते आ रहें हैं.

चुकि अदरक का सेवन हमारे शरीर में गर्माहट भी लाने का काम करता है, इसलिए सर्दी में इसका सेवन जरूरी होता है. यदि आपको अदरक का स्वाद पसंद नहीं है, तो आप अपने स्थानीय फार्मेसी से अदरक कैप्सूल खरीद सकते हैं. लेकिन इस बात का भी हमेसा ध्यान रखें की अदरक का ज्यादा सेवन भी हमारे सेहत के लिए ठीक नही है. एक दिन में एक ग्राम से अधिक अदरक का सेवन नहीं करना सबसे अच्छा है. अदरक के ज्यादा सेवन से आपको गले में जलन और पेट में गैस की समस्या भी हो सकती है. किसी भी बीमारी से परेशानी ज्यादा होने पर अपने डॉक्टर से संपर्क जरूर करें.

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